जयपुर ( सपना जगरिया ): आधुनिकता और भौतिकतावाद की अंधी दौड़ में अब मातापिताओं ने बच्चों को भी शामिल कर लिया है। आज के बच्चे बेस्ट से बेस्ट करने के एक अजीब प्रेसर से गुजर रहे है। समर वेकेशन में भी हॉबी क्लास या अगली क्लास की तैयारी के नाम पर भागदौड़ से लगता है कि बचपन खोता जा रहा है। पेरेंट्स के सपनों को बच्चों पर थोपा जा रहा है। हर माता पिता पड़ौस वाले शर्माजी या वर्माजी के बेटे से अपने बच्चों को आगे देखना चाहते है। या दूर की मौसी की लड़की तो 90 परसेंट से अधिक लाई है जबकि उनकी आमनदनी तो कुछ भी नहीं ये सुना सुना कर बच्चों पर एक मानसिक दबाव बनाया जा रहा है। रही सही कसर इन टीवी वालों ने पूरी कर दी है। अब पेरेंट्स बचपन से ही बच्चों को डांस क्लास या संगीत अकेडमी में भेजकर भविष्य के माइकल जेक्शन या लता मंगेसकर के सपने देखने लगे है और जुगाड़ में लगे है कि उनका बच्चा टीवी के किसी टैलेंट शो में आ जाये। अब बच्चा क्लास में टॉप और डांस में नंबर वन पोजीशन के दोहरे पाट के बीच में पिस रहा है और पिस रहा है उसका बचपन।

बच्चे को अच्छा भविष्य देने के लिए हम सुबह से शाम तक दिनभर काम करते हैं। जिससे उसे अच्छी तालीम दे पाएं। बच्चे को अच्छे से अच्छे कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाने का प्रयास करते है। उसे हम सभी भौतिक सुख सुविधा देते है जिससे उसका भविष्य सुरक्षित हो जाये। और बच्चे से अपेक्षा रखते है कि उसकी बजह से समाज में उनका नाम हो जाए।अपने सामर्थ्य के अनुसार भरसक प्रयास करते है। साथ ही बच्चे से अपेक्षा करते है कि वह हमेशा टॉप आता रहे और उन्हें समाज में सिर ऊँचा करके चलने का मौका दे। लेकिन अधिकतर मामलों में देखा जा रहा है कि कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने के बावजूद भी बच्चे अच्छा नहीं कर पा रहे है। उनकी अपेक्षा ग्रामीण परिवेश के वे बच्चे जो कम संसाधनों में पले बढ़े है कहीं बेहतर परफॉर्मेंस दे रहे है।

मातापिता का अब सोचने का समय है कि कमी कहाँ छोड़ दी ? हमने अपने बच्चों को भीड़ में दौड़ ने के लिए छोड़ दिया है भागो भागो लाइफ इज कंपटीशन तुम्हारे 90 प्रतिशत अंक आए तो यह दिलाऊंगा। बिना यह समझे कि हमारे बच्चे का बैद्धिक एवं शारीरिक स्तर कितना है। क्या हमारा बच्चा 90 प्रतिशत अंक लाने के लिए सक्षम है या नहीं। हमने अपने बच्चों को सभी भौतिक सुख सुविधाएं, शारीरिक सुरक्षा तो प्रदान कर दी लेकिन हमने अपने बच्चों को भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करने में कमी छोड़ दी। बच्चे अपनी बाल सुलभ क्रियाओं को छोड़कर समय से पहले ही परिपक्व होते जा रहे है।
बच्चों की पहली पाठशाला परिवार होती है और गुरु मातापिता। बच्चों का मन जितना कोमल सरल और सहज होता है उससे कहीं ज्यादा जटिल भी। बच्चे हमसे सिर्फ प्यार और सिर्फ प्यार नहीं चाहते बल्कि मां-बाप से उनकी स्वीकृति चाहते हैं की मां-बाप उनकी सफलता ही नहीं बल्कि असफलता को भी स्वीकार करें। उन्हें उनके मन के हिसाब से जीने का हक मिले। पढाई या किसी प्रतियोगित की तैयारी में ही बच्चे नहीं झोंके जायें। उन्हें खेलने और शरारत करने का भी मौका मिले। पेरेंट्स अपने सपनों को बच्चों की आंखों में देखने की जगह उनके सपनों को भी स्वीकार करें । उनके सपनो का सम्मान करें कि वे क्या बनना चाहते है ? क्या करना चाहते गई ? प्रत्येक बच्चे के अंदर अनंत संभावनाएं छुपी होती है। उन संभावनाओं को बाहर आने का अवसर दें।बच्चों को बच्चा ही रहने दें। भागमभाग तो उसे जिंदगीभर करनी है। तो उसके जिंदगी के हसीन पलों को क्यों उससे छीना जा रहा है। इसलिए बच्चों को दोस्त बनें। उनके मेंटर बनें । उन्हें वह सारा परिवेश मिलें जिसमें बच्चे हँसते खेलते हुए अपना मानसिक एवं शारीरिक विकास कर सकें। बच्चों से बात करें। उन्हें समझें जिससे बच्चे स्वस्थ्य रहें और खेलते कूदते अपने लक्ष्य तय करें और उसकी ओर बढ़ें। इसलिए उड़ने दो इन बच्चों को उनके उन्मुक्त आसमान में।

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