भारत की पूर्वोत्तर सीमा का अंतिम गांव है लोंगवा। नागालैंड की सीमा में आने वाला इस गांव को प्राकृतिक सुंदरता के रूप में ईश्वर का आशीर्वाद मिला हुआ है। बेहद सुंदर हरी-भरी वादियों के बीच बसे इस गांव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस गांव का आधा हिस्सा भारत में तो आधा हिस्सा म्यांमार (बर्मा) में पड़ता है। इस गांव में पूर्वोत्तर में सबसे खूंखार माने जाने वाले कोंयाक आदिवासी रहते है। जो अपने दुश्मन का सिर काटने के लिए कुख्यात रहे है।
लोंगवा के निवासियों को दो देशों की नागरिकता
नागालैंड के मोन जिला का एक गांव लोंगाव उत्तर – पूर्वी अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर बसा है। भारत और म्यांमार को अलग करने वाली यह अन्तर्राष्ट्रीय सीमा गांव के बीचों बीच से गुजरी है। इस वजह से गांव का आधा हिस्सा म्यांमार में तो आधा हिस्सा भारत में है। प्रशासनिक व्यवस्था बनाने के लिए इस गांव के लोगों को दोनों देशों ने अपनी अपनी नागरिकता दे रखी है। यह कह सकते है कि भारत का यह इकलौता गांव है जिसके नागरिकों को दो देशों कि नागरिकता प्राप्त है। यहां के लोग दोनों देशों के प्रति समर्पित है। किसी भी तरह का सीमा तनाव यहां देखने को नहीं मिलता है। यहां के लोगों के लिए कहा जाता है कि यहां के लोग खाते म्यांमार में है और सोते भारत में है।
खूंखार क़बीलाई गांव है लोंगवा
पूर्वोत्तर के इस इलाके में 16 जनजातियां रहती है। जो अलग अलग कबीलों के रूप में बसी हुई है। लाेंगवा गांव में बेहद खतरनाक माने जाने वाले कोंयाक कबीले के आदिवासी निवास करते है। 2011की जनगणना के अनुसार इस गांव की जनसंख्या 5132 है। कबिलियाई वर्चस्व के लिए कबीलों में लड़ाईयां होती रहती है। कोंयाक आदिवासियों के लिए यह कहा जाता है कि यह अपने दुश्मनों का सिर धड़ से अलग कर देते थे। और सिर के साथ उत्सव मनाते थे। इसलिए इन्हे हेड हंटर्स कहा जाता है।
इनकी क्रूरता को देखते हुए सरकार ने 1940 में हेड हंटिंग पर प्रतिबन्ध लगा दिया था लेकिन इसके बाद भी यहां हेड हंटिंग चलती रही। अभी भी यह इलाका आधुनिकता से कोसों दूर है। लेकिन यहां के युवा अब बाहर निकले लगे है और जीवन की मुख्य धारा से जुड़ रहे है। इस गांव के मुखिया का एक बेटा म्यांमार की फौज में सैनिक है।

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